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द्रोण पर्व
अध्याय ७०
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सञ्जय़ उवाच
जवेनाभ्यद्रवन्द्रोणं महता निस्वनेन च |  २   क
पाण्डवाः सोमकैः सार्धं ततो युद्धमवर्तत ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति