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द्रोण पर्व
अध्याय ८२
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सञ्जय़ उवाच
स पपात रथोपस्थान्निरमित्रो जनेश्वरः |  २७   क
त्रिगर्तराजस्य सुतो व्यथय़ंस्तव वाहिनीम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति