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शल्य पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
ज्ञातः पापो धार्तराष्ट्रो दृष्टश्चेत्यसकृद्रणे |  ४८   क
प्राक्रोशन्सोमकास्तत्र हृष्टरूपाः समन्ततः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति