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वन पर्व
अध्याय ७०
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वृहदश्व उवाच
सर्वः सर्वं न जानाति सर्वज्ञो नास्ति कश्चन |  ८   क
नैकत्र परिनिष्ठास्ति ज्ञानस्य पुरुषे क्वचित् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति