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आदि पर्व
अध्याय ७१
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शुक्र उवाच
किं ते प्रिय़ं करवाण्यद्य वत्से; वधेन मे जीवितं स्यात्कचस्य |  ४४   क
नान्यत्र कुक्षेर्मम भेदनेन; दृश्येत्कचो मद्गतो देवय़ानि ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति