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आदि पर्व
अध्याय ७१
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वैशम्पाय़न उवाच
गुरोः सकाशात्समवाप्य विद्यां; भित्त्वा कुक्षिं निर्विचक्राम विप्रः |  ४९   क
कचोऽभिरूपो दक्षिणं व्राह्मणस्य; शुक्लात्यये पौर्णमास्यामिवेन्दुः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति