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आदि पर्व
अध्याय ७१
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वैशम्पाय़न उवाच
यो व्राह्मणोऽद्य प्रभृतीह कश्चि; न्मोहात्सुरां पास्यति मन्दवुद्धिः |  ५४   क
अपेतधर्मो व्रह्महा चैव स स्या; दस्मिँल्लोके गर्हितः स्यात्परे च ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति