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वन पर्व
अध्याय २७२
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मार्कण्डेय़ उवाच
स रुषा सर्वगात्रेषु तय़ोः पुरुषसिंहय़ोः |  २३   क
व्यसृजत्साय़कान्भूय़ः शतशोऽथ सहस्रशः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति