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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
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वैशम्पाय़न उवाच
जिष्णुः सहिष्णुर्धृष्णुश्च स एनं पालय़िष्यति |  १५   क
शक्तः स हि महीं जेतुं निवातकवचान्तकः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति