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अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
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विश्वामित्र उवाच
अशुचिर्व्रह्मकूटोऽस्तु ऋद्ध्या चैवाप्यहङ्कृतः |  ६८   क
कर्षको मत्सरी चास्तु विसस्तैन्यं करोति यः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति