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सभा पर्व
अध्याय ७१
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विदुर उवाच
राहुरग्रसदादित्यमपर्वणि विशां पते |  २६   क
उल्का चाप्यपसव्यं तु पुरं कृत्वा व्यशीर्यत ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति