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उद्योग पर्व
अध्याय ७०
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वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं स कालः सम्प्राप्तो मित्राणां मे जनार्दन |  २   क
न च त्वदन्यं पश्यामि यो न आपत्सु तारय़ेत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति