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वन पर्व
अध्याय ७१
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वृहदश्व उवाच
राजापि च स्मय़न्भीमो मनसाभिविचिन्तय़त् |  २४   क
अधिकं योजनशतं तस्यागमनकारणम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति