वन पर्व  अध्याय ७१

वृहदश्व उवाच

नैतदेवं स नृपतिस्तं सत्कृत्य व्यसर्जय़त् |  २६   क
विश्राम्यतामिति वदन्क्लान्तोऽसीति पुनः पुनः ||  २६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति