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विराट पर्व
अध्याय ६५
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वैशम्पाय़न उवाच
न शक्यन्ते ह्यस्य गुणाः प्रसङ्ख्यातुं नरेश्वर |  २०   क
एष धर्मपरो नित्यमानृशंस्यश्च पाण्डवः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति