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द्रोण पर्व
अध्याय ७१
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सञ्जय़ उवाच
ताभ्यां तत्र शरैर्मुक्तैरन्तरिक्षं दिशस्तथा |  १०   क
अभवत्संवृतं सर्वं न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति