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द्रोण पर्व
अध्याय ७१
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सञ्जय़ उवाच
अलम्वुसस्तु सङ्क्रुद्धः कुन्तिभोजशरार्दितः |  १८   क
अशोभत परं लक्ष्म्या पुष्पाढ्य इव किंशुकः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति