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वन पर्व
अध्याय ११३
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लोमश उवाच
दृष्ट्वैव तामृश्यशृङ्गः प्रहृष्टः; सम्भ्रान्तरूपोऽभ्यपतत्तदानीम् |  ७   क
प्रोवाच चैनां भवतोऽऽश्रमाय़; गच्छाव यावन्न पिता ममैति ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति