वन पर्व  अध्याय २०८

मार्कण्डेय़ उवाच

वृहज्ज्योतिर्वृहत्कीर्तिर्वृहद्व्रह्मा वृहन्मनाः |  २   क
वृहन्मन्त्रो वृहद्भासस्तथा राजन्वृहस्पतिः ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति