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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्लुत्य वलो राजन्दत्त्वा दाय़ांश्च पुष्कलान् |  २८   क
जगाम त्वरितो रामस्तीर्थं श्वेतानुलेपनः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति