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शान्ति पर्व
अध्याय ७२
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भीष्म उवाच
अर्थमूलोऽपहिंसां च कुरुते स्वय़मात्मनः |  १५   क
करैरशास्त्रदृष्टैर्हि मोहात्सम्पीडय़न्प्रजाः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति