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शान्ति पर्व
अध्याय ७२
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भीष्म उवाच
यो हि दोग्ध्रीमुपास्ते तु स नित्यं लभते पय़ः |  १७   क
एवं राष्ट्रमुपाय़ेन भुञ्जानो लभते फलम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति