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वन पर्व
अध्याय ११८
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वैशम्पाय़न उवाच
स तेषु तीर्थेष्वभिषिक्तगात्रः; कृष्णासहाय़ः सहितोऽनुजैश्च |  ६   क
सम्पूजय़न्विक्रममर्जुनस्य; रेमे महीपालपतिः पृथिव्याम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति