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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
सैनिकाश्च ततः सर्वे प्राद्रवन्त भय़ार्दिताः |  १२४   क
वय़ं चापि निरुत्साहा हते पितरि तेऽनघ ||  १२४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति