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शान्ति पर्व
अध्याय ७२
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भीष्म उवाच
स्वर्गलोके च महतीं श्रिय़ं प्राप्स्यसि पाण्डव |  ३२   क
असम्भवश्च धर्माणामीदृशानामराजसु |  ३२   ख
तस्माद्राजैव नान्योऽस्ति यो महत्फलमाप्नुय़ात् ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति