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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
चापानि रुक्माङ्गदभूषणानि; शराश्च कार्तस्वरचित्रपुङ्खाः |  २७   क
ऋष्ट्यश्च पीता विमला विकोशाः; प्रासाः सखड्गाः कनकावभासाः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति