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वन पर्व
अध्याय २६५
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मार्कण्डेय़ उवाच
पुत्रोऽहमपि विप्रर्षेः साक्षाद्विश्रवसो मुनेः |  १४   क
पञ्चमो लोकपालानामिति मे प्रथितं यशः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति