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अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
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व्रह्मो उवाच
अकामं तेन वस्तव्यं मुदितेन शतक्रतो |  ४८   क
मम लोके सुरैः सार्धं लोके यत्रापि चेच्छति ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति