आश्वमेधिक पर्व  अध्याय ७२

वैशम्पाय़न उवाच

एवं शुश्राव वदतां गिरो जिष्णुरुदारधीः |  १३   क
स्वस्ति तेऽस्तु व्रजारिष्टं पुनश्चैहीति भारत ||  १३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति