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वन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
उद्यम्य च गदां दोर्भ्यां नदीतीरे व्यवस्थितम् |  २५   क
प्रजासङ्क्षेपसमय़े दण्डहस्तमिवान्तकम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति