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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
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वैशम्पाय़न उवाच
स राजा धर्मजो राजन्दीक्षितो विवभौ तदा |  ४   क
हेममाली रुक्मकण्ठः प्रदीप्त इव पावकः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति