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सभा पर्व
अध्याय ७२
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वैशम्पाय़न उवाच
तं चिन्तय़ानमासीनं धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् |  २   क
निःश्वसन्तमनेकाग्रमिति होवाच सञ्जय़ः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति