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वन पर्व
अध्याय ७२
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वाहुक उवाच
अहमप्यश्वकुशलः सूदत्वे च सुनिष्ठितः |  १२   क
ऋतुपर्णेन सारथ्ये भोजने च वृतः स्वय़म् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति