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वन पर्व
अध्याय ७२
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वाहुक उवाच
न चान्यः पुरुषः कश्चिन्नलं वेत्ति यशस्विनि |  १५   क
गूढश्चरति लोकेऽस्मिन्नष्टरूपो महीपतिः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति