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वन पर्व
अध्याय ७२
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केशिन्यु उवाच
क्व नु त्वं कितव छित्त्वा वस्त्रार्धं प्रस्थितो मम |  १८   क
उत्सृज्य विपिने सुप्तामनुरक्तां प्रिय़ां प्रिय़ ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति