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वन पर्व
अध्याय ७२
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केशिन्यु उवाच
तस्या रुदन्त्याः सततं तेन दुःखेन पार्थिव |  २०   क
प्रसादं कुरु वै वीर प्रतिवाक्यं प्रय़च्छ च ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति