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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
अद्य पाञ्चालराजस्य धृष्टद्युम्नस्य वै निशि |  ३३   क
विरात्रे प्रमथिष्यामि पशोरिव शिरो वलात् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति