वन पर्व  अध्याय ७२

वृहदश्व उवाच

एवं समाहिता गत्वा दूती वाहुकमव्रवीत् |  ५   क
दमय़न्त्यपि कल्याणी प्रासादस्थान्ववैक्षत ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति