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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु दाशार्हो विकिरञ्शरान् |  २९   क
धृष्टद्युम्नं पराक्रान्तं सात्यकिः प्रत्यपद्यत ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति