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विराट पर्व
अध्याय ५३
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अर्जुन उवाच
ससंहाराणि दिव्यानि सर्वाण्यस्त्राणि मारिष |  ५   क
धनुर्वेदश्च कार्त्स्न्येन यस्मिन्नित्यं प्रतिष्ठितः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति