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द्रोण पर्व
अध्याय ७२
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सञ्जय़ उवाच
आकर्षन्तः शरीराणि शरीरावय़वांस्तथा |  १५   क
नराश्वगजसङ्घानां शिरांसि च ततस्ततः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति