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द्रोण पर्व
अध्याय ७२
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सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे निर्मर्यादे विशां पते |  २१   क
धृष्टद्युम्नो हय़ानश्वैर्द्रोणस्य व्यत्यमिश्रय़त् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति