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द्रोण पर्व
अध्याय ७२
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सञ्जय़ उवाच
तपनीय़विचित्राङ्गाः संसिक्ता रुधिरेण च |  ९   क
संसक्ता इव दृश्यन्ते मेघसङ्घाः सविद्युतः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति