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आदि पर्व
अध्याय ७३
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वैशम्पाय़न उवाच
समुच्छ्रय़ं देवय़ानीं गतां सक्तां च वाससि |  १२   क
शर्मिष्ठा प्राक्षिपत्कूपे ततः स्वपुरमाव्रजत् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति