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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
राजानश्चाप्यसन्तुष्टाः परार्थान्मूढचेतसः |  ३६   क
सर्वोपाय़ैर्हरिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति