आदि पर्व  अध्याय ७३

देवय़ान्यु उवाच

एवं हि मे कथय़ति शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी |  ३१   क
वचनं तीक्ष्णपरुषं क्रोधरक्तेक्षणा भृशम् ||  ३१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति