आदि पर्व  अध्याय ७३

देवय़ान्यु उवाच

इति मामाह शर्मिष्ठा दुहिता वृषपर्वणः |  ३३   क
क्रोधसंरक्तनय़ना दर्पपूर्णा पुनः पुनः ||  ३३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति