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शान्ति पर्व
अध्याय ७३
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वाय़ुरु उवाच
स्वधर्मपरितृप्ताय़ यो न वित्तपरो भवेत् |  १५   क
यो राजानं नय़ेद्वुद्ध्या सर्वतः परिपूर्णय़ा ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति