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शान्ति पर्व
अध्याय ७३
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वाय़ुरु उवाच
देवा मनुष्याः पितरो गन्धर्वोरगराक्षसाः |  २१   क
यज्ञमेवोपजीवन्ति नास्ति चेष्टमराजके ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति