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शान्ति पर्व
अध्याय ७३
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वाय़ुरु उवाच
व्रह्मणो मुखतः सृष्टो व्राह्मणो राजसत्तम |  ४   क
वाहुभ्यां क्षत्रिय़ः सृष्ट ऊरुभ्यां वैश्य उच्यते ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति