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महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
अग्निं ते ददृशुस्तत्र स्थितं शैलमिवाग्रतः |  ३३   क
मार्गमावृत्य तिष्ठन्तं साक्षात्पुरुषविग्रहम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति